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कार्ल मार्क्स: एक आत्ममुग्ध विचारक जिसकी विचारधारा ने करोड़ों लोगों की जान ले ली

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Karl marx

कार्ल मार्क्स का जन्म 1818 में जर्मनी के ट्रीयर शहर में हुआ था। 2018 में कार्ल मार्क्स के 200वें जन्मदिन के अवसर पर साम्यवादी चीन ने ट्रीयर को एक प्रतिमा भेंट की। 6.30 मीटर ऊंची यह प्रतिमा कार्ल मार्क्स की थी जो ट्रीयर के लिए गले की हड्डी बन गई। क्योंकि मार्क्सवाद के नाम पर पिछले 100 सालों में जिस तरह का आतंक पूरी दुनिया में मचाया गया है उसके कारण ट्रीयर और जर्मनी के लोग आज भी इस बात पर शर्म महसूस करते हैं कि कार्ल मार्क्स जन्म से एक जर्मन थे।

लेकिन आर्थिक महाशक्ति बन चुके चीन को नाराज करना ट्रीयर की नगरपालिका के लिए मुश्किल था। इसलिए शहर ने यह प्रतिमा स्वीकार तो की लेकिन प्रतीकात्मक विरोध के तौर पर इसका आकार घटाकर 4.40 मीटर कर दिया। आज यह प्रतिमा ट्रीयर के नगर द्वार ‘पोर्टा निग्रा’ पर लगी हुई है। लेकिन जर्मन लोगों से ज्यादा चीनी पर्यटक ही इस प्रतिमा को देखने के लिए आते हैं।

कार्ल मार्क्स का जन्म ट्रीयर के एक मध्यमवर्गीय यहूदी परिवार में आता था। इनके पिता हेरशेल मार्क्स एक वकील थे। उस समय ट्रीयर जर्मनी के पूर्वगामी प्रशिया साम्राज्य का हिस्सा था। प्रशिया के भेदभावपूर्ण कानूनों से परेशान होकर कार्ल मार्क्स के पिता ने ईसाई धर्म अपना लिया और अपना नाम बदलकर हैनरिश मार्क्स रख लिया। वे चाहते थे कि उनका बेटा भी उनकी तरह ही वकील बने। लेकिन कार्ल मार्क्स ने साहित्य और दर्शनशास्र को उच्च शिक्षा के लिए चुना। कार्ल मार्क्स का मानना था कि दर्शनशास्र के बिना कुछ भी नही पाया जा सकता।

दुनिया को बदलने की चाहत:

कार्ल मार्क्स दुनिया को बदलना चाहते थे। उनका मानना था कि “अलग अलग दार्शनिकों ने दुनिया की अलग अलग तरह से व्याख्या तो की है लेकिन इसे बदलने की कोशिश किसी ने नहीं की।” लेकिन मार्क्स ने इसके लिए खुद कभी कुछ नहीं किया। मार्क्स के सारे उपदेश केवल दूसरो के लिए होते थे, वे खुद कभी कुछ नहीं करते थे। लेकिन उनकी विचारधारा से प्रभावित लोगों ने जैसा आतंक इस दुनिया में मचाया और खून की नदियां बहाई वैसा उदाहरण इतिहास में दूसरा नहीं मिलता। इतिहास साक्षी है कि मार्क्स की विचारधारा ने ऐसे ऐसे सनकी और पागल तानाशाहों को जन्म दिया जिन्होंने उन्ही देशों को बर्बाद कर के रख दिया जिनके उद्धार का सपना दिखाकर ये लोग सत्ता में आए थे।

अपनी बहुचर्चित किताब ‘दास कैपिटल’ में मार्क्स लिखते हैं कि पूंजीवाद वह अर्थव्यवस्था है जो निजी स्वामित्व, लाभ कमाने की लालसा और उद्योगपति के निर्णय लेने की स्वतंत्रता पर आधारित होती है। उनका कहना था कि वह पूंजी जो किसी खून चूसने वाले जीव की तरह श्रम के शोषण से फलती फूलती है अंततः आत्मघाती सिद्ध होती है। मार्क्स मानते थे कि श्रमिक एक दिन संगठित होकर क्रांति करते हुए पूंजीवाद को नष्ट कर देंगे। वह अपने दुनिया बदलने के सपने के तहत ऐसा होता हुआ देखना चाहते थे लेकिन उन्होंने कभी भी ऐसा कोई प्रयास नहीं किया जिससे इस तरह की किसी क्रांति की नींव पडती।

मार्क्स की भविष्यवाणी:

मार्क्स के अनुसार मानव समाज वर्ग संघर्ष से बनते और चलते हैं। पूंजीवाद में यह संघर्ष बुर्जुआ (सत्ताधारी वर्ग) और सर्वहारा (मजदूर वर्ग) के बीच होता है। उनके अनुसार पूंजीवादी व्यवस्था में उत्पादन के साधनों पर पूंजीपतियों का वर्चस्व होता है और मजदूर वेतन के बदले में अपना श्रम देकर जरूरत की वस्तुओं का उत्पादन करते हैं। पूंजीपति अधिक से अधिक लाभ कमाने की लालसा के तहत मजदूर वर्ग का शोषण करते हैं और इस शोषण के कारण मजदूरों और पूंजीपतियों के मध्य एक शत्रुता का भाव पनपने लगता है। मार्क्स की भविष्यवाणी थी कि इसी शत्रुता के भाव के कारण एक दिन मजदूर क्रांति के रास्ते पर चल पड़ेंगे और पूंजीवाद अपने ही अंतर्निहित विरोधाभासों के बोझ से चरमरा कर ढह जाएगा। तब समाजवाद नाम की एक नई प्रणाली उसका स्थान लेगी।

हालांकि हुआ बिल्कुल इसका उल्टा। पूंजीवाद आज भी सरपट दौड़ रहा है जबकि जिन देशों में मार्क्सवादी समाजवाद पर आधारित व्यवस्था स्थापित हुई थी वो देश या तो स्वयं टूट गए या फिर उन देशों ने अपनी व्यवस्था को पुनः पूंजीवाद की ओर मोड़ दिया है। चीन, वियतनाम और क्यूबा जैसे दो चार देश ही ऐसे बचे है जो खुद को मार्क्सवादी कहते हैं, हालांकि उनकी अर्थव्यवस्था पूंजीवादी ही है। सिर्फ सत्ता पर कम्युनिस्ट पार्टी का बलात एकाधिकार बना हुआ है, बस।

तो फिर मार्क्सवाद ने दुनिया को क्या दिया:

मार्क्सवाद पर आधारित अर्थव्यवस्था कभी पनप ही नहीं पाई। सोवियत संघ का 1991 में विघटन हो गया तो कम्युनिस्ट चीन ने अपनी अर्थव्यवस्था को पूंजीवाद रूप दे दिया है। पूर्वी यूरोप के तो लगभग सारे समाजवादी राष्ट्र ढह चुके हैं।

ऐसे में ये प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि मार्क्स की विचारधारा से आखिर दुनिया को क्या मिला?

अगर पिछले सौ सालों का इतिहास बिना पक्षपात के देखें तो जाहिर है मार्क्सवाद ने दुनिया को सिवाय निरंकुश सनकी तानाशाहों के अतिरिक्त कुछ नहीं दिया। ऐसे तानाशाह जिन्होंने इस धरती को उन्ही श्रमिकों के खून से लाल कर दिया जिनके दम पर क्रांति कर के वे सत्ता में आए थे, फिर चाहे वो रूस के लेनिन और स्टालिन हो या चीन के माओ। इन तानाशाहों की सनक ने पूरी दुनिया में इतने लोगों की जान ले ली जितने लोग प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्ध में भी नहीं मारे गए।

रूस की बोल्शेविक क्रांति:

रूस में 1917 की तथाकथित ‘महान अक्टूबर समाजवादी क्रांति’ तत्कालीन जार शाही को उखाड़ फेंकने की मजदूरों, किसानों और सैनिकों की एक मिली जुली क्रांति थी। सोवियत संघ के समय के कम्युनिस्टों ने उसे खूब महिमामंडित किया। लेकिन क्रांति के जार कालीन दमनकारी तानाशाही का स्थान कुछेक कम्युनिस्ट नेताओं के निरंकुश दमनचक्र ने ले लिया। अकेले तीन दशकों तक स्टालिन के शासनकाल में ही एक करोड़ 20 लाख लोगों को बंदी बनाकर गुलग के श्रम शिविरों में भेज दिया गया, जिनमें से 20 लाख से ज्यादा वापस नहीं लौटे।

1930 के दशक में स्टालिन का सफाई अभियान शुरू हुआ। हिटलर फासिस्ट था, उसके निशाने पर यहूदी, कम्युनिस्ट, भारतवंशी रोमा और सिंती और राजनीतिक विरोधी थे। जबकि स्टालिन कम्युनिस्ट था और उसके निशाने पर सब लोग थे। मजदूर, किसान, पूंजीवादी ही नहीं, उसकी अपनी पार्टी के अपने ही मंत्री व सहयोगी भी।

रूसी इतिहासकार रॉय मेदवेदेव के अनुसार स्टालिन के शासनकाल में उनकी निरंकुशता के कारण लगभग दो करोड़ लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। लगभग इतने ही सोवियत नागरिक द्वितीय विश्वयुद्ध में हिटलर के सैनिकों के हाथों मारे गए थे।

चीन की माओवादी क्रांति:

अगर तुलनात्मक रूप से देखा जाए तो माओ, स्टालिन से भी कहीं आगे बढ़ चुके थे। चीनी गृहयुद्ध के दौरान माओ को सिर्फ विजय चाहिए थी। किसी भी कीमत पर। उन्होंने आदेश दिया, ‘नागरिक जनता की कोई परवाह नहीं करनी है। शहरों को मरघट बना दो।’ लिन बियाओ, माओ की लाल सेना के सेनाध्यक्ष थे। उन्होंने माओ के आदेश का आंख मूंद कर पालन किया।

माओ गृहयुद्ध में जीत से पहले भी तानाशाह थे और जीत के बाद तो उनकी तानाशाही निरंकुश हो गई। अपने अजीबोगरीब सनकी फैसलों के कारण माओ के राज में पूरे चीन में लगभग साढ़े तीन करोड़ लोग मारे गए।

अलग अलग देशों में मार्क्सवाद के कारण मारे गए लोग:

मार्क्स की विचारधारा से प्रभावित अलग अलग देशों की सरकारों के कारण मारे गए लोगों की कुल संख्या दोनों विश्वयुद्धों में मारे गए लोगों से कहीं अधिक है। हर देश के बारे में अचूक और आधिकारिक आंकड़े तो उपलब्ध नहीं है, पर पिछले कुछ दशकों में प्रकाशित आंकड़ों और शोधकार्यों के आधार पर विशेषज्ञों ने जो अनुमान लगाएं हैं, वे इस प्रकार हैं- 

प्रथम विश्वयुद्ध में तीन करोड़ 70 लाख और द्वितीय विश्वयुद्ध में छह करोड़ 60 लाख लोग मारे गए थे। विभिन्न मार्क्सवादी देशों में विचारधारात्मक कारणों, राजनीतिक अभियानों और ऊलजुलूल निर्णयों के कारण मारे गए लोगों का विवरण इस प्रकार है

  • चीन में 1949 से 1987 के बीच माओ के काल में 3,52,36,000
  • सोवियत संघ में 1918 से 1922 तक चले गृहयुद्ध में 62,10,000 और 1922 से 1991 के बीच 5,86,27,000
  • उत्तर कोरिया में 31,63,000 और 1995 से 1998 के बीच भूख से मरे 25,00,000
  • कंबोडिया में 1975 से 1987 तक चले पोल पोट शासन के दौरान 26,27,000
  • अफगानिस्तान में 1978 से 1992 तक की रूस समर्थक सरकारों के दौरान 17,50,000
  • वियतनाम में 1945 से 1987 तक (वियतनाम युद्ध के अलावा) 16,70,000
  • इथियोपिया में 1974 से 1991 के बीच 13,43,000  
  • भूतपूर्व युगोस्लाविया में 1945 से 1992 के बीच 10,72,000  
  • मोज़ाम्बीक में 1975 से 1990 के बीच 7,00,000
  • रोमानिया में 1947 से 1989 के बीच 4,35,000 
  • बुल्गारिया में 1946 से 1990 के बीच 2,22,000
  • अंगोला में 1975 से 1992 के बीच 1,25,000 
  • मंगोलिया में 1924 से 1992 के बीच 1,00,000 
  • अल्बानिया में 1946 से 1991 के बीच 1,00,000  
  • क्यूबा में 1961 से अब तक 73,000  
  • भूतपूर्व पूर्वी जर्मनी में 1949 से 1990 के बीच 70,000  
  • भूतपूर्व चेकोस्लोवाकिया में 1948 से 1990 के बीच 65,000 
  • लाओस में 1975 से अब तक 56,000  
  • हंगरी में 1949 से 1989 के बीच 27,000
  • पोलैंड में 1948 से 1989 के बीच 22,000  

इन आंकड़ों से ये तो जाहिर है कि मार्क्सवाद चाहे कितना भी तार्किक लगे लेकिन अंततः वह दुनिया के लिए विनाशकारी ही सिद्ध हुआ है। ये आंकड़े कोई दबे छुपे नहीं है। ये सार्वजनिक हैं और दुनियाभर में मार्क्स के भक्त इनसे अच्छी तरह से परिचित हैं।

लेकिन फिर भी भारत जैसे कुछ देशों में उनके भक्त आज भी उनके नाम की माला जपते और उनकी तस्वीरों पर फूलमालाएं चढ़ाते हैं। ऐसे वामपंथियों को एक बार मार्क्स के व्यक्तिगत चरित्र से परिचय करवा देना भी आवश्यक है।

अपने मित्रों और परिवार के पैसों पर जीने वाले परजीवी मार्क्स:

जर्मनी के ब्यौरन और सीमोन अकस्तिनात भाइयों, जिन्होंने ‘मार्क्स उंत एंगेल्स इंटीम’ नाम से कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स के पत्रों का प्रकाशन किया हैं, बताते हैं कि, मुख्यत: सभी लोग यही मानते हैं कि मार्क्स सर्वहारा के मसीहा थे। पूंजीपतियों, कुलीनों और सामंतों से लडने की गुहार लगाते थे। पर, उनके जीवन में निकट से झांकने पर हम पाते हैं कि कहने को तो वे मेहनत मजदूरी करने वालों को शोषण से मुक्ति दिलाना चाहते थे किन्तु मूलतः उन्हें महामूर्ख ही मानते थे। ब्यौरन अकस्तिनात का कहना है, अपनी कई चिठ्ठियों में उन्होंने मजदूरों को अपमानित किया है और किसानों को भी नहीं बख्शा है। अकस्तिनात भाइयों के मुताबिक यह अकारण ही नहीं है कि बहुत से कम्युनिस्ट या मार्क्सवाद से प्रभावित वामपंथी शोषित और दलितों के उद्धार का दावा करते हैं, लेकिन जब कभी भी उनके हाथ सत्ता लग जाती है वे तानाशाह हो जाते हैं और सत्ता छोड़ने का नाम ही नहीं लेते।

मार्क्स के लिखे निजी पत्रों में पैसे की भी प्रमुख भूमिका देखने में आती है। उनको पढ़ कर लगता है कि उनकी जीवन शैली काफी ठाठ बाट वाली रही होगी। वे हमेशा इसी फिराक में रहते थे कि कहां से कितना पैसा उगाहा जा सकता है। दूसरी ओर इन पत्रों से उन उपायों का कोई अता पता नहीं मिलता कि गरीबों की मदद कैसे हो और यथासंभव सभी लोग खुशहाली में कैसे रहें। यही बात उनके परम मित्र एंगेल्स के साथ भी थी। मार्क्स के पिता नामी वकील थे तो एंगेल्स के पिता नामी उद्योगपति थे। मार्क्स और एंगेल्स दोनों आरामतलब थे। दूसरों की जीवनशैली की निन्दा करते थे जबकि दूसरों के पैसों पर ही परजीवी की तरह रहते थे।

मार्क्स कितने मार्क्सवादी थे ये उनके निम्न वक्तव्यों से आसानी से समझा जा सकता है-

  • जितना मै जानता हूं, वह यही है कि मै कोई मार्क्सवादी नहीं हूं।
  • फ्रांसीसियों को तो कूटा जाना चाहिए।
  • इस्लाम मुसलमानो और नास्तिकों के बीच एक सतत शत्रुता की स्थिति पैदा कर रहा है।
  • इन मजदूरों से भी बड़ा सम्पूर्ण गधा तो कोई हो ही नहीं सकता।
  • मै इस खंड (दास कैपिटल) को और लंबा खींच रहा हूं क्युकी जर्मन कुत्ते किताबों को आयतन में नापते हैं।
  • मैंने अपनी बातें स्वाभाविक ही इस प्रकार रखी है कि उनका उल्टा अर्थ लगाने पर भी मै ही सही साबित होऊं।
  • जर्मन और स्कैंडिनेवियाई दोनों ही उत्तम नस्ल के हैं, इन्हे आपस में लडने की जगह एक हो जाना चाहिए।
  • कुत्ता यदि अभी मर जाता है तो मै भी अपनी बला से छुटकारा पा जाऊंगा। ( अपने एक रिश्तेदार के बारे में जिससे मार्क्स ने पैसा उधार ले रखा था)

पंकज कुमार भारतीय जनसंचार संस्थान के छात्र रहे हैं. पंकज मूल रूप से राजस्थान के निवासी है और राजनीति, अर्थव्यवस्था समेत अन्तर्राष्ट्रीय मुद्दों पर लिखना पसंद करते हैं. पंकज के ब्लॉग का नाम https://www.thehindiblogging.in/ है. आप यहाँ जाकर भी पंकज के लेख पढ़ सकते हैं.

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