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Guru Purnima 2020: आज है गुरु पूर्णिमा, जानें-इसकी धार्मिक कथा और महत्व

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Guru Purnima Hindi Wallpapers

Guru Purnima 2020: आज गुरु पूर्णिमा है। इस दिन महाकाव्य रचियता वेदव्यास का जन्म हुआ है। आज के दिन गुरु के निमित्त पूजा और उपासना की जाती है। ऐसा कहा जाता है कि हर एक व्यक्ति के जीवन में गुरु का होना बहुत जरूरी है। गुरु के बिना ज्ञान हासिल नहीं होता है। आइए, गुरु पूर्णिमा की व्रत कथा, महत्व और पूजा विधि जानते हैं-

गुरु पूर्णिमा महत्व

धार्मिक ग्रंथों में लिखा है कि जिस तरह व्यक्ति इच्छा प्राप्ति के लिए ईश्वर की भक्ति करता है। ठीक उसी तरह व्यक्ति को जीवन में सफल होने के लिए गुरु की सेवा और भक्ति करनी चाहिए। साथ ही गुरु प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील रहना चाहिए। गुरु शिष्य के जीवन में व्याप्त अंधकार को मिटाकर प्रकाश फैलाते हैं। अतः गुरु पूर्णिमा का विशेष महत्व है।

गुरु पूर्णिमा की कथा

पौराणिक कथा के अनुसार, वेदव्यास भगवान विष्णु के अंश स्वरूप कलावतार हैं। इनके पिता का नाम ऋषि पराशर था। जबकि माता का नाम सत्यवती था। वेद ऋषि को बाल्यकाल से ही अध्यात्म में रुचि थी। इसके फलस्वरूप इन्होंने अपने माता-पिता से प्रभु दर्शन की इच्छा प्रकट की और वन में जाकर तपस्या करने की अनुमति मांगी, लेकिन उनकी माता ने वेद ऋषि की इच्छा को ठुकरा दिया।तब इन्होंने हठ कर लिया, जिसके बाद माता ने वन जाने की आज्ञा दे दी। उस समय वेद व्यास के माता ने उनसे कहा कि जब गृह का स्मरण आए तो लौट आना। इसके बाद वेदव्यास तपस्या हेतु वन चले गए और वन में जाकर कठिन तपस्या की। इसके पुण्य प्रताप से वेदव्यास को संस्कृत भाषा में प्रवीणता हासिल हुई।

इसके बाद इन्होंने वेदों का विस्तार किया और महाभारत, अठारह महापुराणों सहित ब्रह्मसूत्र की भी रचना की। इन्हें बादरायण भी कहा जाता है। वेदव्यास को अमरता का वरदान प्राप्त है। अतः आज भी वेदव्यास किसी न किसी रूप में हमारे बीच उपस्थित हैं।

गुरु पूर्णिमा पूजा विधि

इस दिन प्रातः काल में उठकर गंगाजल युक्त पानी से स्नान ध्यान करें। इसके बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करें। अब घर में पूजा स्थान पर व्यास-पीठ बनाकर निम्न मंत्रों से गुरु का आह्वान करें।

”गुरुपरंपरासिद्धयर्थं व्यासपूजां करिष्ये”

गुरुर्ब्रह्मा ग्रुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।

गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥

अब गुरु की तस्वीर रख उनकी पूजा जल, फल, फूल, दूर्वा, अक्षत, धूप-दीप आदि से करें। अंत में आरती कर उनके पैर छूकर उनसे आशीर्वाद प्राप्त करें। यह व्रत सूर्योदय के बाद और चंन्द्र उदय तक किया जाता है।

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